राजकीय माघी पूर्णिमा मेला का भव्य आगाज
उपायुक्त व पुलिस अधीक्षक ने दीप प्रज्वलित तथा गंगा पूजन कर किया मेले का उद्घाटन
राजमहल(झारखंड)
झारखंड के एतिहासिक नगरी राजमहल स्थित उत्तरवाहिनी पावन गंगा नदी का धार्मिक दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण है। सनातन धर्म परंपरा में विशेष तिथियों पर उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान को महत्वपूर्ण माना जाता है ।आदिकाल से गंगा तट पर माघी पूर्णिमा के अवसर पर माघी मेला लगता आ रहा है।गंगा तट पर डुबकी लगाने के लिए जो आदिवासी समुदायों का जन सैलाब उमड़ता है, उसे आदिवासियों का महाकुंभ कहा जाता है । माघी मेला सनातनी परंपरा का एक अनोखा संगम है ।जो गंगा के तट पर स्वत: स्फूर्त:आयोजित होती है।राजमहल गंगा तट पर लगने वाली आदिवासियों का महाकुंभ संपूर्ण झारखंड का एक अमूल्य प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर है ।माघी मेला साफाहोड़ आदिवासियों के बीच आस्था व श्रद्धा का प्रमुख केंद्र है।गंगा तट पर साफाहोड़ आदिवासी श्रद्धालु अपने रीती रिवाज से माँ गंगा का पूजा आर्चना करते है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक राजकीय माघी पूर्णिमा मेला इस वर्ष भी पूरी भव्यता के साथ शुरू हो गया है। राजमहल की पावन उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर आयोजित इस मेले में न केवल झारखंड बल्कि बिहार,असम, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से भी हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे हैं।
सांस्कृतिक धरोहर का केंद्र है राजमहल: हेमंत सती
रविवार को राजकीय माघी पूर्णिमा मेला का उद्घाटन उपायुक्त हेमंत सती ,पुलिस अधीक्षक अमित कुमार सिंह व अन्य ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया ।

मेले को संबोधित करते हुए साहिबगंज के उपायुक्त हेमंत सती ने कहा कि राजमहल और साहिबगंज के निवासियों के लिए यह सौभाग्य की बात है कि वे इस पावन मिट्टी पर निवास करते हैं, जहाँ उत्तरवाहिनी गंगा बहती है। उन्होंने इस स्थान की तुलना प्रयागराज (इलाहाबाद) के संगम से करते हुए कहा कि राजमहल की उत्तरवाहिनी गंगा का महत्व और पवित्रता किसी भी मायने में कम नहीं है।
मेला में की गई व्यवस्थाओं का दिए जानकारी:
उपायुक्त श्री सती ने विशेष रूप से आदिवासी समुदाय के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए कहा कि दूर-दराज के प्रदेशों से आने वाले श्रद्धालु यहाँ गंगा पूजन करते हैं और यहाँ का पवित्र जल अपने धार्मिक स्थलों (जैसे जाहिर स्थान) पर अर्पण करते हैं, जो हमारी समृद्ध संस्कृति का द्योतक है। इस क्रम में उन्होंने मेले के सफल आयोजन के लिए जिला प्रशासन द्वारा की गई व्यवस्थाओं की जानकारी भी देते हुए कहा की पूरे मेला क्षेत्र में साफ-सफाई की पुख्ता व्यवस्था और पर्याप्त रोशनी के लिए लाइट्स लगवाई गई हैं।शाम के समय विशेष सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है, जिसमें आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिलेगी। बेहतर विधि-व्यवस्था के लिए मैजिस्ट्रेट्स और अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की तैनाती की गई है।
मेला में हैं पुलिस सुरक्षा के कड़े इंतजाम: अमित कुमार सिंह
एसपी अमित कुमार सिंह ने कहा की श्रद्धालुओं की सुरक्षा के लिए पुलिस पूरी तरह से मुस्तैद है । उन्होंने बताया कि मेला क्षेत्र में सघन पुलिस गश्ती की जा रही है। रात के समय सुनसान और संवेदनशील इलाकों में बाइक पेट्रोलिंग के जरिए सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया गया है। पूरे मेला क्षेत्र में सुरक्षा की निगरानी के लिए 20 विशेष पुलिस पोस्ट स्थापित किए गए हैं। वाहनों के आवागमन को सुचारू बनाए रखने के लिए ट्रैफिक मैनेजमेंट को प्राथमिकता दी गई है।

श्रद्धालुओ के लिए की गई है व्यवस्था:
जिला प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओ के लिए विभिन्न व्यवस्था की गई है।जंहा सुरक्षा के दृष्टिकोण से गंगा तट पर बांस व बल्ला से बेरिकेटिंग लगाया गया है ।गंगा स्नान करने वाले महिला श्रद्धालुओ के वस्त्र चेंज करने के लिए व्यवस्था की गई है।गंगा में सुरक्षा को लेकर एनडीआरएफ की टीम भी गश्ती कर रहा है।किसी अनहोनी से निपटने के लिए गोताखोर तैनात की गई है।रेलवे मैदान परिसर,एसडीओ कार्यालय कार्यालय परिसर सहित कई जगह पर भक्तो के रुकने के लिए टेंट लगाया गया है।जगह –जगह शौंचालय की व्यवस्था की गई है।
आदिवासी संस्कृति का एक प्राचीन अध्यात्मिक झलक:
राजमहल गंगा तट पर लगाये गये अखाड़ा ने सनातनी परंपरा का आस्था व श्रद्धा देखा जा रहा है ।साफाहोड़ आदिवासी अपने रीति रिवाज से माँ गंगा का पूजा अर्चना करने में जुटे है।साफाहोड़ होड़ समुदाय द्वारा की जाने वाली पूजन पद्धति हड़प्पाकालीन सभ्यता से जुड़ी नजर आती है।ऐसी पूजा की अनूठी प्रणाली शायद ही कंही देखने मिलती होगी।यंहा जानगुरुओ द्वारा अपने अपने अनुयायियों के साथ अलग अलग स्थानों पर अखाड़ा लगाया गया है ।गंगा तट से लेकर विभिन्न जगहों पर दर्जनों अखाड़ा लगाया गया है।गुरुओ के अखाड़ो में बैठने वाले उनके शिष्य होते है ।गुरु शिष्य परंपरा का ऐसा अनूठा प्राचीनतम उदाहरण शायद ही कंही देखने को मिलता होगा।शिष्यों के शारीरिक ,आर्थिक एवं मानसिक कष्टों का निवारण अपने अपने विशिष्ठ अध्यात्मिक शैली से गुरुओ द्वारा किया जाता है ।साफाहोड़ आदिवासी संस्कृति का एक प्राचीन अध्यात्मिक झलक यंहा देखने को मिलता है ।









